अंतर्दृष्टि: ओशो के प्रवचन Osho Speech in Hindi

Osho Pravachan and Osho Speech in Hindi

ओशो के प्रवचन | Osho Speech in Hindi

चीजों को, जैसी वे दिखाई पड़ती हैं, उनको वैसी ही मत मान लेना। उनके भीतर बहुत कुछ है | एक आदमी मर जाता है। हमने कहा, आदमी मर गया। जिस आदमी ने इस बात को यही समझ कर छोड़ दिया, उसके पास अंतर्दृष्टि नहीं है| गौतम बुद्ध एक महोत्सव में भाग लेने जाते थे। रास्ते पर उनके रथ में उनका सारथी था और वे थे। और उन्होने एक बूढे आदमी को देखा। वह उन्होंने पहला बूढ़ा देखा।

जब गौतम बुद्ध का जन्म हुआ, तो ज्योतिषियों ने उनके पिता को कहा कि यह व्यक्ति बड़ा होकर या तो चक्रवर्ती सम्राट होगा और या संन्यासी हो जाएगा। उनके पिता ने पूछा कि मैं इसे संन्यासी होने से कैसे रोक सकता हूं ? तो उस ज्योतिषि ने बडी अद्भूत बात कही थी। वह समझने वाली है। उस ज्योतिषि ने कहा, अगर इसे संन्यासी होने से रोकना है, तो इसे ऐसे मौंके मत देना जिसमें अंतर्दृष्टि पैदा हो जाए। पिता बहुत हैरान हुए – यह क्या बात हुई ? उनके पिता ने पूछा। ज्योतिषि ने कहा, इसको ऐसे मौंके मत देना कि अंतर्दृष्टि पैदा हो जाए। तो पिता ने कहा, यह तो बडा मुश्किल हुआ, क्या करेंगे ?

उस ज्योतिषी ने कहा कि इसकी बगिया में फूल कुम्हलाने के पहले अलग कर देना। यह कभी कुम्हलाया हुआ फूल न देख सके। क्योंकि यह कुम्हलाया हुआ फूल देखते ही पूछेगा, क्या फूल कुम्हला जाते हैं ? और यह पूछेगा, क्या मनुष्य भी कुम्हला जाते हैं ? और यह पूछेगा, क्या मैं भी कुम्हला जाऊंगा ? और इसमें अंतर्दृष्टि पैदा हो जाएगी। इसके आस-पास बूढे लोगों को मत आने देना। अन्यथा यह पूछेगा, ये बूढे हो गए, क्या मैं भी बूढा हो जाऊंगा ? यह कभी मृत्यु को न देखे। पीले पत्ते गिरते हुए न देखे। अन्यथा यह पूछेगा, पीले पत्ते गिर जाते है, क्या मनुष्य भी एक दिन पीला होकर गिर जाएगा ? क्या मैं गिर जाऊंगा ? और तब इसमें अंतर्दृष्टि पैदा हो जाएगी।

पिता ने बडी चेष्टा की और उन्होंने ऐसी व्यवस्था की, कि बुद्ध के युवा होते-होते तक उन्होंने पीला पत्ता नहीं देखा, कुम्हलाया हुआ फूल नहीं देखा, बूढा आदमी नहीं देखा, मरने की कोई खबर नहीं सुनी। फिर लेकिन यह कब तक हो सकता था ? इस दुनिया में किसी आदमी को कैसे रोका जा सकता है कि मृत्यु को न देखे ? कैसे रोका जा सकता है कि पीले पत्ते न देखे ? कैसे रोका जा सकता है कि कुम्हलाये हुए फूल न देखे ?

लेकिन मैं आपसे कहता हूं, आपने कभी मरता हुआ आदमी नहीं देखा होगा, और कभी आपने पीला पत्ता नहीं देखा, अभी आपने कुम्हलाया फूल नहीं देखा। बुद्ध को उनके बाप ने रोका बहुत मुश्किल से, तब भी एक दिन उन्होंने देख लिया। आपको कोई नहीं रोके हुए है और आप नहीं देख पा रहे है। अंतर्दृष्टि नहीं है, नहीं तो आप संन्यासी हो जाते। यानी सवाल यह हैं, क्योंकि उस ज्योतिषि ने कहा था कि अगर अंतर्दृष्टि पैदा हुई तो यह संन्यासी हो जाएगा। तो जितने लोग संन्यासी नहीं है, मानना चाहिए, उन्हें अंतर्दृष्टि नहीं होगी।

खैर, एक दिन बुद्ध को दिखाई पड़ गया। वे यात्रा पर गए एक महोत्सव में भाग लेने और एक बूढा आदमी दिखाई पडा और उन्होंने तत्क्षण अपने साथी को पूछा, इस मनुष्य को क्या हो गया ?
उस साथी ने कहा , यह वृद्ध हो गया।
बुद्ध ने पूछा , क्या हर मनुष्य वृद्ध हो जाता है ?
उस साथी ने कहा, हर मनुष्य वृद्ध हो जाता है।
बुद्ध ने पूछा, क्या मेैं भी ?
उस साथी ने कहा, भगवन, कैसे कहूं! लेकिन कोई भी अपवाद नहीं है। आप भी हो जाएंगे।
बुद्ध ने कहा, रथ वापस लौटा लो, रथ वापस ले लो।
सारथी बोला, क्यों ?
बुद्ध ने कहा, मैं बूढा हो गया।
यह अंतर्दृष्टि है। बुद्ध ने कहा, मैं बूढा हो गया। अदभुत बात कही। बहुत अदभुत बात कही।
और वे लौट भी नहीं पाए कि उन्होंने एक मृतक को देखा और बुद्ध ने पूछा, यह क्या हुआ ?
उस सारथी ने कहा, यह बुढापे के बाद दूसरा चरण है, यह आदमी मर गया।
बुद्ध ने पूछा, क्या हर आदमी मर जाता है ?
सारथी ने कहा, हर आदमी।
और बुद्ध ने पूछा, क्या मैं भी ?
और सारथी ने कहा, आप भी। कोई भी अपवाद नहीं है।
बुद्ध ने कहा, अब लोैटाओ या न लौटाओ, सब बराबर है।
साथी ने कहा, क्यों ?
बुद्ध ने कहा, मैं मर गया।

यह अंतर्दृष्टि है। चीजों को उनके ओर-छोर तक देख लेना। चीजें जैसी दिखाई पडें, उनको वैसा स्वीकार न कर लेना, उनके अंतिम चरण तक। जिसको अंतर्दृष्टि पैदा होगी, वह इस भवन की जगह खंडहर भी देखेगा। जिसे अंतर्दृष्टि होगी, वह यहां इतने जिंदा लोगों की जगह इतने मुर्दा लोग भी देखेगा-इन्हीं के बीच, इन्हीं के साथ। जिसे अंतर्दृष्टि होगी, वह जन्म के साथ ही मृत्यु को भी देख लेगा, और सुख के साथ दुःख को भी, और मिलन के साथ विछोह को भी।

अंतर्दृष्टि आर-पार देखने की विधि है। और जिस व्यक्ति को सत्य जानना हो, उसे आर-पार देखना सीखना होगा। क्योंकि परमात्मा कहीं और नहीं है, जिसे आर-पार देखना आ जाए उसे यहीं परमात्मा उपलब्ध हो जाता है। वह आर-पार देखने के माध्यम से हुआ दर्शन है। ओशो रजनीश

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धन्यवाद!!!!!!

36 Comments

  1. एक ध्यान अन्न पर करनेसे परमात्मा का द्वार खोल सकता है जो हमारे मस्तिषक कि टोच है जो इस नश्वर देह से कोई सबंध नही रखते परमात्मा।धन्यवाद।

  2. Mujhe ak question ye puchhna hai ,kyu har
    inshan
    ko antardristi nahi dikhta
    .kyu hm inshan wastiwikta ko swikar nahi kar pate.janm se hi Maya me fase rahte hai.thank u osho ji

    1. Hame sab dikhai deta h par ham dekhna nhi chahte hame sab pta v h par ham maanna nhi chahte …Jab bachpan SE hame MOH millta h tab ham virodh nhi kar sakte …Jab virodh karne ke layak ho jate h tab MOH ko chodna nhi chahte tab ham kudh adhik MOH paal lethe h or Puri pura jiwan unhe pura Karne me laga dete h …Kyoki saral rashto par par bachpan SE hame chalaya jata h fir hame us rashte me aanand aane lagta h …Fir hame agar apna raashta banana h to bht mushkil ho jata h …Kyoki Jo raashta aap banaoge us par koi koi apke sath nhi hoga ……………… Roshan Rajput….

  3. If i aquire spiritualvision and abandon all worldly things then what will be happen with parents who bear me and give facility for a higher education and also their worldly willing as marriage etc

    1. मुझे बहुत सुकुन मिलता है जब मैं ओशो जी के विचार पड़ता हूँ !मैं अपने अकेलेपन को ऐसे ही दूर करता हूँ धन्यवाद प्रभु ओशो जी !!!!

  4. OSHO IS MY FAVOURATE TEACHER AND PHILOSPHER AND FANTASTIC SAINT IN REAL WAY OF LIFE’S ALL SITUATIONS AND CIRCUMTENCES AND GRIEFNESS AND HAPPINESS AND ABOUT LIVE AND DEAD AND TRUTHNESS OF LIFE AND GOD DEFINITION OF EVERY THING OF HUMANITY

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