मृत्युदेव : अध्यात्म के महान गुरु Adhyatma in Hindi

Gyan Adhyatma in Hindi

मेरे जीवन में 4 जुलाई 1977 को सुबह एक घटना तब घटी जब मैं फुटपाथ पर किसी के इन्तजार में खड़ा था। कई दिनों से मेरी नींद सिर्फ 4 घंटे की चल रही थी और सुबह के वक्त मेरे मन में सांसरिक घटनाओं के विभिन्न पहलुओं पर चिंतन चलता रहता था।

उस दिन सुबह 9 बजे मैं सड़क के किनारे खड़ा एक लड़के की समस्या के बारे में विचारमग्न था। धनप्राप्ति तथा प्रतिष्ठा के अनुसार उसके पिता उसे डाक्टरी कोर्स कराना चाहते थे। अतः पिता उसे डाक्टरी कोर्स में जबर्दस्ती दाखिला दिला देते हैं लेकिन रुचि न होने के कारण फेल होने पर लड़के को एक-दो वर्ष में कॉलेज से निकाल दिया जाता है।

लड़के की जिंदगी बर्बाद हो जाती है क्योंकि वह न तो डाक्टर बना और न ही इंजीनियर। मैंने मन में सोचा कि उसकी जिंदगी में इस असफलता के लिए कौन जिम्मेदार है। अधिकतर लोग तो उसके पिता को ही जिम्मेदार ठहरायेंगे लेकिन कुछ समझदार लोग तो भगवान को ही जिम्मेदार समझेंगे।

इस दृष्टिकोण के हिसाब से विश्व में होने वाली समस्त विपत्तियों की जड़ भगवान को समझते हुए मैंने अपनी पूरी आंतरिक शक्ति से भगवान पर दोषारोपण किया।

तभी मुझे एक जबर्दस्त आघात-सा लगा तथा साथ ही कड़कती बिजली की भांति एक आवाज सुनाई दी – “उसके (लड़के के) कर्म ही उसके जिम्मेदार हैं यदि इस जन्म के नहीं तो पिछले जन्म के”।

मैंने तुरंत ही निष्कर्ष निकाला हमारे राजमर्रा की जिंदगी में भगवान का कोई दोष नहीं है तथा जीवन की चुनौतियाँ स्वीकार करना तथा निभाना व्यक्ति विशेष पर ही निर्भर है। एक नशेड़ी की तरह मैंने भगवान को दोषी ठहराना चाहा पर भगवान तो पूर्णतः निर्दोष हैं।

यह सब अल्प समय में ही घटित हो गया। अगले क्षण मैं आश्चर्य कर रहा था कि अचानक मैं जमीन पर गिर पड़ा। मेरा हृदय इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि लगा यह फट पड़ेगा। पिछले दिन ही तो डायरी खरीदी थी जिसमें मैंने हृदयाघात, जो कि ज्यादा समय तक तनाव, दुश्चिंता एवं भय के कारण होता है, से बचाव के चार उपाय लिखे थे। वह चार उपाय इस प्रकार हैं –

1. दो ग्लास ठंडा पानी पीना
2. मनपसंद भजन अथवा फिल्मी गीत गुनगुनाना
3. शांत एवं संयत बने रहना
4. कारण से ध्यान हटाना

मैं तुरंत ही पास के होटल में गया और दो ग्लास पानी पिया, रेडियो पर जो गाना चल रहा था उसकी तरफ ध्यान दिया और समाचार पत्र झपटा। हृदय को सामान्य स्थिति में आने में लगभग 10 मिनट का समय लगा। तत्पश्चात मैंने भगवान को हृदय से धन्यवाद देने की झड़ी लगा दी और अपनी डायरी में लिखा – “मैं इस अलौकिक अनुभव के लिए उपकृत हूँ परंतु दुबारा हृदयाघात होने की स्थिति में मैं (शरीर) जिंदा न रहूँगा।”

इसके बाद मैं दिव्य मदहोशी की हालत में सिर्फ दो मीटर की दूरी तक नीची निगाह किए चल रहा था। मैं अपने को दिव्य स्थिति में महसूस कर रहा था। मेरे मन में आध्यात्मिक विचार आने शुरू हो गए और हालत यह थी कि मैं कभी-कभी उन्हें पूरी तरह लिखने में असमर्थ था। मैं अपने को एक उच्च अधिकारी के सामने आशुलिपिक की भांति महसूस कर रहा था। डायरी के प्रत्येक पृष्ठ पर ऊपर लिखा कि “मैं” का प्रयोग भूतकाल के अलावा अब न किया जाये।

जब मन की एकाग्रता या अंतर्बोध जाग्रत हो जाता है तो बहुत-सी साधारण कहावतों, जो किसने कहीं या कैसे शुरू हुईं, का अर्थ बहुत ही रोमांचक हो जाता है। कई जगह मैंने लिखा – “तू ही सबमें (जड़ एवं चैतन्य) समाया है”, “तूफान, तरंग, परमाणु आदि की शक्ति तू ही है”, “तू ही कण-कण में समाया है”।

भगवान के स्वरूप के बारे में मैंने सोचा कि मनुष्य भगवान को मानव के रूप में समझता है। इसी प्रकार पशु, पक्षी एवं वनस्पति भी अपने मन में सोचते होंगे। चूंकि भगवान सभी में तथा सभी जगह समाया है अतः उसे निराकार ही माना जा सकता है। आत्मा भी पानी की भांति है और इसे जिस पात्र में डाला जाता है उसी का आकार ग्रहण कर लेता है। मैंने इस प्रकार निष्कर्ष निकाला कि भगवान भी अपनी सृष्टि में व्याप्त है।

शीघ्र ही मुझे आंतरिक प्रेरणा हुई कि मुझे श्रीमदभगवद्गीता पढ़नी चाहिए जिससे मैंने जो कुछ डायरी में लिखा है या महसूस कर रहा हूँ, उसकी पुष्टि की जा सके। गीता प्रैस से प्रकाशित श्रीमदभगवद्गीता में दिये गए परिशिष्ट – “परिवार में रहते हुए त्याग से भगवत-प्राप्ति” को मैं विशेष रूप से पढ़ना चाहता था क्योंकि मेरा तीन बच्चों का परिवार था। चूंकि मैं लिखने एवं विचारों में ही खोया हुआ था अतः शरीर की आवश्यक देखभाल करना मैं भूल गया था।

इसलिए दो हज़ार किलोमीटर दूर स्थित अपने जन्मस्थान से परिवार को शीघ्र लाना आवश्यक हो गया। 8 जुलाई 1977 को मैं घर के लिए रेलगाड़ी से रवाना हुआ और तीसरे दिन पहुँच गया। अगले दस दिनों तक मुझे नींद बिलकुल महसूस नहीं हुई औए कभी-कभी पाँच-दस मिनट की झपकी से मैं तरोताजा हो जाता था।

मैंने निष्कर्ष निकाला कि मनुष्य का जीवन कबड्डी के खेल की भांति है। इसमें हमारे पाँच सद्गुण – बल, बुद्धि, विद्या, संतोष एवं करुणा एक तरफ हैं तथा इनके विपरीत पाँच दुर्गुण – काम(वासना), क्रोध, अहंकार, लोभ एवं मोह विद्यमान हैं। मनुष्य का जीवन ही खतरे में पड़ जाता है यदि उसका कोई सद्गुण, उससे संबंधित विरोधी दुर्गुण के कारण नष्ट हो जाता है। फिर भी इतना है कि यदि कोई करुणा की अंतिम सीढ़ी पर है तो उसके मोहग्रस्त होने की दशा में भगवान उसके मोह के कारण को हटा कर वापिस उसे सही स्थिति में ले आते हैं।

इन पांचों सद्गुणों के धरण करने तथा इनके विरोधी पांचों दुर्गुणों को छोड़ देने से मन को अपूर्व शांति की प्राप्ति होती है। मन सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त हो कर फिर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता।

परिवार को लेकर मैं नौकरी की जगह 18 जुलाई को वापस लौटा। 14 दिन लगातार जागने तथा भागदौड़ करने के कारण स्वास्थ्य खराब हो गया तथा हृदय की तकलीफ बढ़ गई। तीव्र चिंतन तथा निराशाजनक आर्थिक स्थिति के कारण मैं जीवन की वास्तविकता के धरातल पर आ गिरा। लेकिन मैंने इसकी ज्यादा परवाह न की क्योंकि मेरा मन उस समय बिना किसी कारण के बेझिझक प्राण न्यौछावर करने की स्थिति में था।

ऐसी स्थिति में 16 अगस्त को मुझे पक्का विश्वास हो गया कि 20 अगस्त की रात को 12 बजे मेरा देहावसान निश्चित है। अगले दिनों में, मैं हृदय पर अवश्यंभावी मृत्यु का आभास महसूस करता रहा। अंततः 20 अगस्त को ऑफिस से लौटते ही मेरा पेट मलरहित हो गया। ऐसी विकट घड़ी में खाने की बिलकुल इच्छा न होते हुए भी मैंने एक रोटी खाई। लगभग 9 बजे मैं नजदीक के डॉक्टर के औषधालय में गया पर डॉक्टर पार्टी में गया हुआ था और रात के 12 बजे से पहले उसके लौटने की कोई संभावना नहीं थी।

अंत में मैंने सोचा कि चलो मृत्यु का सामना करते हैं। मैंने पत्नी से निवेदन किया कि वह 12 बजे तक जागी रहे। समय देखने के लिए सिरहाने अलार्म घड़ी रखकर मैं बिस्तर पर लेता हुआ था कि पत्नी भी 11.30 पर सो गई। लगभग 11:45 पर मुझे मृत्यु आती प्रतीत हुई। अचानक मुझे महसूस हुआ कि मेरा शरीर नहीं है तथा कंठ में सिर्फ श्वांस चलने का आभास हो रहा था। ऐसे समय में परिवार के मोह से ग्रस्त होकर मैं भगवान (अदृश्य या निराकार) से तर्क-वितर्क में उलझ गया कि मेरे तीन बच्चे, जो पास में ही लेटे थे, अनाथ हो जाएंगे और इस परिवार को भीख मांगकर ही अपने शहर में जाना संभव होगा। प्रभु, तुम्हारा क्या बिगड़ जाएगा यदि इन बच्चों की खातिर मेरा जीवन बख्श दिया जाये। मेरा शरीर भी वृद्ध नहीं है क्योंकि मैं सिर्फ 32 साल का ही हूँ। नाते-रिश्ते में कोई ऐसा नहीं है जो इन बच्चों की देखभाल और पालन कर सके।

अचानक तर्क-वितर्क रुक गए। जब मुझे वापस होश आया तो 12.05 हो चुके थे। उस समय विशुद्ध चेतना का गवाह मात्र होने एवं मृत्यु के जबड़े से वापस आने के अमित आनंद की कोई तुलना नहीं हो सकती। परिवार के प्रति मेरे मोह के कारण ही मुझे भगवान से तर्क-वितर्क करना पड़ा एवं मोक्ष पद को भी ठुकराना पड़ा। प्रसन्नतापूर्वक मैंने पत्नी को जगा कर बताया कि अब चिंता की कोई बात नहीं है तथा संकट की घड़ी टल गई है और मैंने आत्मा की सही स्थिति को महसूस कर लिया है। अगले 10-15 मिनट में पूरे शरीर की चेतना वापस आ गई।

फिर भी, आगामी रविवार के दिनों में विशेषतया हृदय में मैं अशक्तता क्षीणता महसूस करता रहा। किसी की मृत्यु का समाचार मुझे इस हद तक उद्वेलित कर देता था कि मुझे अपनी मृत्यु आती प्रतीत होती थी। मुझमें इतना साहस भी नहीं था कि 4 जुलाई एवं 20 अगस्त की घटनाओं को मैं किसी से कह पाता। यदि कोशिश भी करता तो मेरे हाथ-पैर की उँगलियाँ सुन्न पड़ने लगतीं। यद्यपि मैं उस बारे में किसी से कुछ कहने की स्थिति में नहीं था फिर भी मन नहीं मानता था। चुप रहूँ या कुछ कहूँ, इस बारे में अन्तर्मन में अंतर्द्वंद चलता रहता।

फिर आया 11 सितंबर का दिन। मैं घर से 7 किलोमीटर दूर एक पुस्तकालय में पढ़ रहा था कि मुझे हृदय पर मृत्यु का आभास प्रतीत हुआ। तुरंत पुस्तकालय से उठकर मैं सड़क पर चल दिया और मन में सोचता जा रहा था – “भले ही मेरा यह शरीर सड़क पर चलते-चलते छूट जाये। मुझे इस शरीर के छूटने का बिलकुल भय नहीं है जिस शरीर के रहते हुए मन में मृत्यु भय विद्यमान है। परिवार क्या समस्त विश्व का दायित्व तो भगवान पर है जिसकी यह सृष्टि है।” “मुझे ले लो” – ऐसा मन में सोचते ही मेरा शरीर तथा मन तत्क्षण ही पूर्णतः स्वस्थ हो गए और मन प्रसन्नता से भर गया।

इस प्रकार इन तीन घटनाओं (4 जुलाई, 20 अगस्त एवं 11 सितंबर) ने मुझे इस मन एवं शरीर के झूठे अहंकार से मुक्त कर दिया और इस भावना को बनाए रखने के लिए साकार भगवान के साथ संबंध की शुरुआत हो गई। इस प्रकार ज्ञान मार्ग जिसका उद्देश्य आत्मज्ञान है वह 20 अगस्त को सम्पन्न हुआ और मैं साकार भगवान की शरणागति ग्रहण कर भक्ति मार्ग पर चल दिया।

मित्रों यह लेख हमें स्वामी प्रसाद शर्मा जी ने भेजा है उनका मानव जीवन क्या है ? और जीवन का लक्ष्य क्या है ? लेख के बाद यह अगला लेख है उनके लिखने की कला और बात को समझाने का ढंग वाकई प्रशंशनीय है| आगे भी प्रसाद जी के लेख प्रकाशित होंगे इसके लिए स्वामी प्रसाद शर्मा जी को दिल से धन्यवाद

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