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Rahim ke Dohe रहीम के दोहे अर्थ सहित

Rahim Das ke Dohe in Hindi

रहीम दास जी का पूरा नाम अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना था। इनका जन्म 7 दिसम्बर 1556 को लाहौर में हुआ था। इनके पिता का नाम बैरम ख़ाँ और माँ का नाम सुल्ताना बेगम था। इनके पिता अकबर के संरक्षक थे।

रहीम के दोहे हम बचपन से किताबों में पढ़ते आते हैं। कबीर दास जी के बाद सबसे ज्यादा रहीम दास जी के दोहे ही प्रसिद्ध हैं। इनके सभी दोहे बहुत ही प्रेरक हैं और हर व्यक्ति को अच्छे जीवन का सन्देश देते हैं।

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Rahim ke Dohe

देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन ।
लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि देने वाला तो कोई और है, वो ईश्वर दिन रात हमको देता ही रहता है। और लोग इतने मूर्ख हैं वो सोचते हैं कि हम ही सब कुछ कर रहे हैं इससे ज्यादा मूर्खता और क्या हो सकती है।

एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय ।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि एक ईश्वर की प्रार्थना करो। पूरी निष्ठा से उपासना करने से सभी मनोकामनायें पूरी होती हैं। अगर बिना मन को शांत किये किसी भी देवी देवता की उपासना की जाये तो कोई मनोकामना पूरी नहीं होगी वो व्यर्थ है। जिस प्रकार कोई माली पेड़ की जड़ की जगह अगर फल, फूल या पत्तियों को सींचता रहे तो पेड़ सूख जायेगा अर्थात हमें जड़ यानि मूल को ही सींचना चाहिए।

रहिमन पानी राखिए,बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरे , मोती, मानुष , चून ।।

अर्थ – रहीम दास जी ने इस दोहे में 3 बार पानी शब्द का प्रयोग किया है और हर बार पानी शब्द का अलग मतलब है। 1. पानी = प्रतिष्ठा सम्मान 2. पानी = चमक 3. पानी = जल। प्रत्येक चीज़ के लिए पानी बहुत जरुरी है बिना पानी के संसार कुछ भी नहीं है। इंसान को पानी यानि मान सम्मान बनाये रखना चाहिए। मोती को पानी यानि चमक बनाये रखनी चाहिए नहीं तो उसका कोई मोल नहीं रहेगा। और पानी यानि जल के बिना तो हर जीव का जीवन ही खत्म हो जायेगा।

तरुवर फल नहिं खात है,सरवर पियहि न पान।
कहि रहीम पर काज हित ,संपति सँचहि सुजान।।

अर्थ – रहीमदास जी कहते हैं कि पेड़ अपने फल खुद नहीं खाता और समुद्र अपना पानी खुद नहीं पीता। रहीमदास जी कहते हैं कि सज्जन लोग हमेशा दूसरों के लिए जीते हैं। परोपकारी लोग सुख संपत्ति भी केवल परोपकार के लिए ही जोड़ते हैं।

जे गरीब सों हित करें ,ते रहीम बड़ लोग।
कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग।।

अर्थ – रहीमदास जी कहते हैं कि जो लोग गरीबों की मदद करते हैं, हर संभव तरीके से उनके हित की बात सोचते हैं। ऐसे लोग महान होते हैं। सुदामा एक गरीब इंसान थे और श्री कृष्णा द्वारिका के राजा थे लेकिन कृष्ण ने मित्रता निभाई और आज उन दोनों की मित्रता के किस्से बड़ी महानता से सुनाये जाते हैं।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष ब्यापत नहीं , लिपटे रहत भुजंग।।

अर्थ – रहीमदास जी कहते हैं कि जो लोग अच्छे विचारों वाले और सज्जन होते हैं उनपर दुष्टता का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। जैसे चन्दन के पेड़ पर सांप लिपटे रहते हैं लेकिन फिर भी चन्दन अपनी खुशबु और गुण नहीं छोड़ता।

रहिमन जिह्वा बाबरी, कह गई सरग -पताल।
आपु तु कहि भीतर गई, जूती खात कपाल।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि इंसान को सदैव बड़ा ही सोच समझ कर बोलना चाहिये। ये जीभ को बावली है, कटु शब्द कहकर मुंह के अंदर छिप जाती है। और उसका परिणाम बेचारे सर को भुगतना पड़ता है क्योंकि लोग सिर पर ही जूतियां मारते हैं।

रहिमन ओछे नरन ते, भलो बैर ना प्रीति।
काटे-चाटे स्वान के, दुहूँ भाँति बिपरीति।।

अर्थ – रहीम दास जी इस दोहे में कहते हैं कि दुष्ट लोगों से ना तो मित्रता अच्छी है और ना ही दुश्मनी। जैसे कुत्ता चाहे गुस्से में काटे या फिर प्यार से तलवे चाटे, दोनों इस स्थिति कष्टदायी होती हैं। दुष्ट लोगों से तो दूरी ही अच्छी है।

टूटे सुजन मनाइए , जो टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि-फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि अपने प्रियजनों को रूठने पर मना लेना चाहिये। चाहे वो सौ बार रूठें लेकिन आपको अपने प्रियजनों को जरूर मना लेना चाहिए। जैसे किसी माला के टूट जाने पर हम फिर से मोती पिरोकर माला कोई जोड़ लेते हैं वैसे ही प्रियजनों को भी रूठने पर मना लेना चाहिये

जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो करै, बढ़े अँधेरो होय ।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि दीपक और सुपुत्र एक समान होता है। जब तक दीपक जलता है चारों ओर प्रकाश रहता है, अगर दीपक बुझ जाये तो अँधेरा हो जाता है ठीक उसी प्रकार सुपुत्र जिस घर में होता है वहां यश और कीर्ति फैलाता है और उसके जाते ही सब सूना हो जाता है।

रहिमन वे नर मर चुके, जे कछु माँगन जाहिं ।
उनते पहले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि वे लोग मर चुके हैं जो दूसरों से मांगते हैं। जो लोग अपनी खुद मदद नहीं कर सकते और दूसरों से मांगते हैं वो मृत समान हैं और उनसे भी पहले वो लोग मर चुके हैं जो मांगने पर भी याचक की नहीं करते।

रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय।
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय॥

अर्थ – रहीमदास जी कहते हैं कि आप किसी जगह अपना मन लगा के तो देखिये, आपको सफलता जरूर मिलेगी। इंसान अगर अच्छी नीयत से प्रयास करे तो नारायण को भी वश में किया जा सकता है।

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु नहि चाहिए, वे साहन के साह।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि संत लोगों के मन की सारी चिंताएं मिट जाती हैं और उनका मन शांत हो जाता है। ऐसे संत मुनि जिनको किसी भी तरह की कोई चाह नहीं है. ऐसे लोग तो शहंशाहों के भी शहंशाह होते हैं।

रहिमन चुप हो बैठिए, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर।।

अर्थ – रहीमदास जी कहते हैं कि चिंता मत करो, सब्र करो क्योंकि दिन फिरने में समय नहीं लगता। सबके दिन फिरते हैं और जब अच्छे दिन आते हैं तो सारे काम खुद ही बन जाते हैं।

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय।
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गांठ परि जाय।।

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि आपसी प्रेम और परस्पर सहयोग की भावना रूपी धागा टूटने मत दीजिये। क्योंकि अगर एक बार धागा टूट जाये तो दोबारा जोड़ने पर उसमें गाँठ पड़ जाती है। वैसे ही रिश्ते टूटकर जब फिर से जुड़ते हैं तो मन में एक गाँठ बन जाती है।

रहिमन देख बडिन को , लघु ना दीजिये डारि
जहा काम आवे सुई ,का करी है तरवारि

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि बड़ी वस्तु को देखकर छोटी चीजों को फेंक नहीं देना चाहिए। जिस प्रकार जो काम सुई कर सकती है वो काम कोई तलवार नहीं कर सकती अर्थात हर चीज़ का अपना एक अलग महत्व है चाहे छोटी हो या बड़ी।

बिगड़ी बात बने नही , लाख करो किन कोउ
रहिमन फांटे दूध को , मथे ना माखन होय

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि एक बार अगर बात बिगड़ जाये तो फिर लाख प्रयासों के बाद भी बात नहीं बनती जैसे दूध एक बार फट जाये तो फिर उसका ना ही दूध बनता है और ना ही मक्खन। इसलिए हर काम बड़ा ही सोच और समझ कर ही करें।

कही रहिम सम्पति सगे , बनत बहुत बहु रीत
विपति कसौटी जे कसे , तेई सांचे मीत

अर्थ – रहीमदास जी कहते हैं कि जब तक संपत्ति साथ होती है तो बहुत से रिश्ते और मित्र बन जाते हैं लेकिन विपत्ति के समय जो हमारा साथ देता है वही सच्चा मित्र होता है।

थोथे बादर क्वार के , ज्यो रहीम छहरात |
धनी पुरुष निर्धन भये , करे पाछिली बात ||

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि क्वार के महीने में जो बादल होते हैं वो केवल गड़गड़ाहट की आवाज करते हैं लेकिन उनमें पानी नहीं होता ठीक वैसे ही धनी इंसान निर्धन हो जाने के बाद भी अपना अमीरी का घमंड नहीं छोड़ता और पिछली बातों को याद कर करके घमंड करता है लेकिन मनुष्य को हर परिस्थिति में एक ही जैसा व्यव्हार करना चाहिए।

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय.
सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय

अर्थ – रहीम दास जी कहते हैं कि व्यक्ति को अपने मन का दुःख अपने मन में ही रखना चाहिए क्योंकि दूसरे लोग आपके दुःख को सुनकर इठला भले ही लें लेकिन कोई आपके दुःख का दर्द बाँट नहीं सकता।

जो बड़ेन को लघु कहें, नहीं रहीम घटी जाहिं
गिरधर मुरलीधर कहें, कछु दुःख मानत नाहिं

रहीमदास जी कहते हैं कि किसी बड़े को अगर कोई छोटा भी कहता है तो इससे बड़े का बड़प्पन नहीं घटता जैसे गिरिधर श्री कृष्ण को मुरलीधर कहने से उनकी महिमा में कोई कमी नहीं आती है|

समय पाय फल होत है, समय पाय झरी जात,
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछितात

रहीमदास जी कहते हैं कि हर चीज़ समय आने पर ही होती है| समय आने पर ही वृक्ष पर फल लगता है और समय आने पर वह पेड़ से झड़ भी जाता है| समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिए दुःख के समय शोक नहीं करना चाहिए क्यूंकि सुख भी समय आने पर ही आएगा|

दोनों रहिमन एक से, जों लों बोलत नाहिं,
जान परत हैं काक पिक, रितु बसंत के माहिं

रहीमदास जी कहते हैं कि सज्जन पुरुष और कुपुरुष दोनों देखने में एक ही जैसे होते हैं लेकिन व्यक्ति के व्यवहार और वाणी से उसकी सज्जनता का पता चलता है| जैसे कौआ और कोयल जब तक कुछ बोलते नहीं है तब तक वो दोनों देखने में एक ही जैसे होते हैं लेकिन वसंत के समय में कोयल की मधुर आवाज से कौआ और कोयल में फर्क नजर आता है|

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि
जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि

रहीमदास जी कहते हैं कि बड़ी चीज़ के आने की वजह से छोटी चीज़ों को ठुकराना नहीं चाहिए क्यूंकि जो काम सुईं कर सकती है वह काम कभी तलवार नहीं कर सकती|

अगर आपके पास रहीमदास के प्रसिद्ध दोहे हैं तो आप हमें कमेंट कर सकते हैं| आपके दोहे रहीमदास जी के दोहों के संकलन में शामिल किये जायेंगे..धन्यवाद!!!

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4 Comments

  1. surendra
    • Pawan Kumar
  2. Babita Singh
  3. amit singh