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जयशंकर प्रसाद की हिंदी कविताएं | Jaishankar Prasad Poems in Hindi

Hindi Poems of Jaishankar Prasad : कवि जयशंकर प्रसाद की 5 सुंदर कविताएं (Jaishankar Prasad Poems in Hindi) – बीती विभावरी जाग री, झरना, तुम्हारी आँखों का बचपन, हिमाद्रि तुंग शृंग से और सब जीवन बीता जाता है, को पढ़ें और छायावाद के प्रमुख कवि जयशंकर प्रसाद के अलंकृत शब्दों का आनंद लें|

बीती विभावरी जाग री – Jaishankar Prasad Hindi Poem

बीती विभावरी जाग री!
अम्बर पनघट में डुबो रही
तारा घट ऊषा नागरी।

खग कुल-कुल सा बोल रहा
किसलय का अंचल डोल रहा
लो यह लतिका भी भर ला‌ई
मधु मुकुल नवल रस गागरी।

अधरों में राग अमंद पिये
अलकों में मलयज बंद किये
तू अब तक सो‌ई है आली
आँखों में भरे विहाग री।

बीती विभावरी जाग री! कवि जयशंकर प्रसाद ने अपनी इस कविता में उषाकाल (प्रातःकाल) का बेहद सुन्दर वर्णन किया है| जयशंकर प्रसाद नायिका से कहते हैं कि विभावरी यानि रात्रि बीत चुकी है अब तुम्हें जाग जाना चाहिए|

तुम्हारी आँखों का बचपन – जयशंकर प्रसाद की कविता

तुम्हारी आँखों का बचपन!

खेलता था जब अल्हड़ खेल,
अजिर के उर में भरा कुलेल,
हारता था हँस-हँस कर मन,
आह रे, व्यतीत जीवन!

साथ ले सहचर सरस वसन्त,
चंक्रमण करता मधुर दिगन्त,
गूँजता किलकारी निस्वन,
पुलक उठता तब मलय-पवन।

स्निग्ध संकेतों में सुकुमार,
बिछल,चल थक जाता जब हार,
छिड़कता अपना गीलापन,
उसी रस में तिरता जीवन।

आज भी हैं क्या नित्य किशोर
उसी क्रीड़ा में भाव विभोर
सरलता का वह अपनापन
आज भी हैं क्या मेरा धन!

तुम्हारी आँखों का बचपन!

तुम्हारी आँखों का बचपन – इस कविता में कवि कहते हैं कि जब बचपन था तो सबकुछ अपना था हँसते थे, खेलते थे, अल्हड़ मौज मस्ती करते थे वो बचपन के दिन अब केवल आखों में बसे हैं, क्या आज हम आज भी वैसे हैं जैसे बचपन में थे कितना सरल था वो बचपन|

हिमाद्रि तुंग शृंग से – Poem of Jaishankar Prasad in Hindi

हिमाद्रि तुंग शृंग से - Jaishankar Prasad Poems in Hindi

हिमाद्रि तुंग शृंग से
प्रबुद्ध शुद्ध भारती–
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला

स्वतंत्रता पुकारती–‘अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!’

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ
विकीर्ण दिव्यदाह-सी,
सपूत मातृभूमि के–
रुको न शूर साहसी!

अराति सैन्य–सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो, जयी बनो – बढ़े चलो, बढ़े चलो!

हिमाद्रि तुंग शृंग से – जयशंकर प्रसाद की यह कविता देशभक्ति की भावना से ओत प्रोत है| इस कविता में कवि देश के सैनिकों और नौजवानों का उत्साह बढ़ाते हुए कहते हैं कि तुमको प्रतिज्ञा करनी है और हर मुश्किल का सामना करके आगे बढ़ते जाते जाना है|

झरना- जयशंकर प्रसाद की कविता

मधुर हैं स्रोत मधुर हैं लहरी
न हैं उत्पात, छटा हैं छहरी
मनोहर झरना।

कठिन गिरि कहाँ विदारित करना
बात कुछ छिपी हुई हैं गहरी
मधुर हैं स्रोत मधुर हैं लहरी

कल्पनातीत काल की घटना
हृदय को लगी अचानक रटना
देखकर झरना।

प्रथम वर्षा से इसका भरना
स्मरण हो रहा शैल का कटना
कल्पनातीत काल की घटना

कर गई प्लावित तन मन सारा
एक दिन तब अपांग की धारा
हृदय से झरना-

बह चला, जैसे दृगजल ढरना।
प्रणय वन्या ने किया पसारा
कर गई प्लावित तन मन सारा

प्रेम की पवित्र परछाई में
लालसा हरित विटप झाँई में
बह चला झरना।

तापमय जीवन शीतल करना
सत्य यह तेरी सुघराई में
प्रेम की पवित्र परछाई में॥

झरना – झरना कविता में जयशंकर प्रसाद झरने की सुंदरता पर प्रकाश डालते हैं| झरना की सुन्दर छटा और उसकी सुन्दर गिरती लहरें मन को भाती हैं इसे देखकर हृदय को बहुत सुन्दर लगता है|

सब जीवन बीता जाता है

धूप छाँह के खेल सदॄश
सब जीवन बीता जाता है

समय भागता है प्रतिक्षण में,
नव-अतीत के तुषार-कण में,
हमें लगा कर भविष्य-रण में,

आप कहाँ छिप जाता है
सब जीवन बीता जाता है

बुल्ले, नहर, हवा के झोंके,
मेघ और बिजली के टोंके,
किसका साहस है कुछ रोके,

जीवन का वह नाता है
सब जीवन बीता जाता है

वंशी को बस बज जाने दो,
मीठी मीड़ों को आने दो,
आँख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है
सब जीवन बीता जाता है||

सब जीवन बीता जाता है – इस कविता में जयशंकर प्रसाद जी कहते हैं कि जीवन की उधेड़बुन में उलझे हुए मानव का जीवन बिता चला जाता है| समय पंख लगाकर उड़ता चला जाता है और हम भविष्य के सपनों को साकार करने में जीवन को व्यतीत करते जाते हैं|

छायावाद युग के कवि जयशंकर प्रसाद की ये 5 कवितायेँ मुझे बेहद पसंद आयीं इसलिए इन्हें यहाँ प्रकाशित किया गया है| जयशंकर प्रसाद जी की कामायनी, आंसू और भी काफी प्रसिद्ध कविताएं हैं जिन्हें जल्दी ही हम प्रकाशित करेंगे| आपको यह कविताएं कैसी लगीं हमें कमेंट करके जरूर बताइये| हिंदीसोच से जुड़े रहिये और नयी जानकारियां अपने ईमेल पर प्राप्त करने के लिए हमें सब्स्क्राइब करें….Subscribe करने के लिए यहाँ क्लिक करें

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